अदृश्य पीया - 18

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(शाम का समय। राधिका किचन में खड़ी है। चूल्हे पर दूध उबल रहा है।)(उसका ध्यान बार-बार भटक रहा है। दिल में अजीब-सी घबराहट।)माँ का दिल कभी-कभी बिना देखे भी सब समझ लेता है।(अचानक बच्चों के कमरे से आवाज़ आती है।)आरुषि (हँसते हुए) बोली - “अरे अंकल! ऐसे मत खड़े रहो ना!”(राधिका का हाथ रुक जाता है।)राधिका (खुद से) बोली - “अंकल? घर में तो कोई आया नहीं…”(राधिका दबे पाँव बच्चों के कमरे की तरफ बढ़ती है।)(दरवाज़ा आधा खुला है।)(वो अंदर झाँकती है।)(कमरे में आरुषि और आरव हैं।)(आरुषि ऐसे देख रही है जैसे किसी से बात कर रही हो।)आरुषि बोली - “आंटी तो बहुत