पवित्र बहु - 8

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चित्र मायके में थी…माँ के आँगन में बैठी हुई… पर मन कहीं और अटका था – दिव्यांश में… दिव्यम में… उस घर में जहाँ उसे रोज़ अपमान मिलता था, फिर भी उसने उसे अपना मान लिया था।लेकिन यह मायका भी अब सुकून नहीं दे रहा था।शाम के समय वह बालकनी में खड़ी थी। नीचे गली में कुछ पड़ोस की औरतें बैठी थीं। जानबूझकर तेज़ आवाज़ में बातें कर रही थीं।“अरे वही है ना… जिसे उसके पति ने छोड़ दिया था…”“हाँ हाँ… चरित्र ढीला होगा तभी तो छोड़ा होगा।”“भली औरत होती तो पति क्यों छोड़ता?”“अब देखो, बार-बार मायके भाग आती है…