भक्त प्रह्लाद - 4

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अजेय वरदान की प्राप्तिअसुर नगरी में जो भी घटित हुआ, उससे अनभिज्ञ असुरराज हिरण्यकशिपु अपनी तपस्या में लीन था। तपस्या करते-करते हिरण्यकशिपु को कई वर्ष बीत गए, लेकिन अभी तक उसे इच्छित परिणाम की प्राप्ति नहीं हुई थी। उसका शरीर अत्यंत कमजोर हो गया था, भुख-प्यास सब लुप्तप्रायः हो गई थी, लेकिन अभी तक वह इच्छित फल की प्राप्ति से वंचित था। उसके मन में यदा-कदा यह विचार भी आता कि वह तपस्या छोड़कर वापस लौट चले, लेकिन अगले ही क्षण उसके अंतर्मन से आवाज निकलती, ‘नहीं असुरराज, नहीं। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तुम इतने वर्षों से कठोर