मनोरमा देवी ने अब बीच का रास्ता चुनने का मन बना लिया था। वे एक मँझी हुई खिलाड़ी की तरह खेल रही थीं। उन्होंने तय किया कि वे न तो पूरी तरह वंशिका की तरफ होंगी और न ही काया को अपना सरमाय बनायेंगी। उनका लक्ष्य साफ़ था—दोनों के बीच ऐसा युद्ध छिड़वा देना कि दोनों एक-दूसरे को काटती रहें और सत्ता की चाबी मनोरमा के पास सुरक्षित रहे।वे वंशिका के सामने काया पर काम का बोझ बढ़ाकर उसका जीना हराम करतीं, ताकि वंशिका को लगे कि सासू माँ उसकी तरफ हैं। वहीं काया के सामने वे वंशिका के आलस