श्रापित एक प्रेम कहानी - 55

दयाल की बात सुनकर दक्षराज जौर जौर से हंसने लगता है और कहता है---> हा हा हा हा । मेरे साथ रहकर तेरी भी बुध्दी काम करने लगी है दयाल। वही घर के उपर बैठे मातंक और त्रिजला यह सब दैखकर हैरान था। त्रिजला मांतक से कहती है--> स्वामी इस मानव की बात सुनी आपने कितना स्वार्थवान है ये। हम बहोत से घरों में गए पर इसके जैसा मानव नही दैखा। स्वामी मुझे तो ऐसा आभास हो रहा है के जिसे हम ढुंढ रहे हैं कहीं यही मानव तो नही है। त्रिजला की बात सुनकर मातंक कहता है--> हां त्रिजला मुझे भी ऐसा