श्रापित एक प्रेम कहानी - 54

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सभी आलोक की और बड़े गौर से दैख रहा था । आलोत अपनी जारी रखते हुए कहता है--> उनकी सरीर पर लगी खरोंचे किसी इंसान के नही हो सकते है। इतनी बड़ी और गहरी नाखुन किसी इंसान के हो ही नही सकते । आलोक की बात सुनकर एकांश कहता है--> तुम बिल्कुल सही कह रहे हो आलोक । मैने भी निलु काका के खरोंचे को दैखा वो इंसान के नाखुन नही हो सकते। ये लोग हम सब से कुछ छुपा रहे है। क्योकी आज कुछ दैर पहले एक आदमी मेरे पास आया और कहां के कल मेले के भाग दौड़ मे