संस्मरण मेरी साहित्यिक यात्रा - सुधीर श्रीवास्तव से यमराज मित्र तक ******** विद्यार्थी जीवन में अखबार पढ़ने की आदत और कहानियां, कविता के लेखकों की तरह अपना नाम देखने का लोभ मेरी साहित्यिक यात्रा की कुंजी है। आगे चलकर थोड़ा बहुत पत्रकारिता में रुचि स्थानीय पत्र पत्रिकाओं से सीधे जुड़ाव से जानकारी और घुलने मिलने की प्रवृत्ति और स्तर के अनुरूप मिलने वाले ज्ञान, प्रोत्साहन और विकल्पों ने आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।उस समय कुछेक अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशन, प्राप्त सम्मानों, कवि सम्मेलनो और कुछ वरिष्ठों ने निरंतर उत्साहित किया। लगभग १९८५ से शुरू हुई यात्रा लगभग