अहमदाबाद प्रतुल मोतवाणी के शहर वाले घर के बाहर गहमागहमी थी। महँगी गाड़ियाँ एक के बाद एक आ रही थीं— लो-स्लंग सुपरकार्स, रेस-ट्यून सेडान्स, ट्रैक-डे स्पेशल्स। ड्राइववे पर सिक्योरिटी वाले व्यस्त थे— हाथों के इशारे, वॉकी-टॉकी, पार्किंग स्लॉट। दस बजे एक बड़ी मीटिंग होनी थी। उसी आवाजाही में, एक ऑटो आकर रुका। नील उतरा। हाथ में एक मुड़ी हुई पर्ची—जिस पर पता लिखा था। दाढ़ी शेव की हुई थी, पर हल्की-सी फिर उग आई थी। किराये की शर्ट—मैली नहीं, बस थकी हुई। कंधे पर वही पुराना झोला। वह बड़े फाटक की ओर बढ़ा। सिक्योरिटी गार्ड ने हाथ उठा दिया। “रुको।”