दिव्य अंश (एक अदृश्य उदय) - 3

मंदिर की ठंडी सीढ़ियाँ उतरते समय रुद्रांश की देह का वजन जैसे हवा हो गया था। कल तक जो लड़का अपनी ही परछाई से कतराकर चलता था, आज उसकी रीढ़ एकदम सीधी थी और चौड़े कंधों में एक अजीब सा ठहराव था। उसकी आँखों में वह पुरानी सहमी हुई धुंध छंट चुकी थी; उसकी जगह एक ठंडी, बेखौफ चमक ने ले ली थी। उसके जूतों के पत्थरों पर पड़ने की आवाज़ में अब कोई हड़बड़ाहट नहीं, बल्कि एक तयशुदा लय थी।पहाड़ी से नीचे उतरकर जैसे ही उसने गाँव की धूल भरी पगडंडी पर कदम रखा, सामने से उसका चचेरा भाई,