पर्दे के पीछे - 3

सब औरतों की हँसी-मज़ाक चल रही थी।किसी के नए सूट की बात…किसी के मायके जाने की तैयारी…किसी के भजन मंडली की चर्चा…सब कुछ सामान्य था।हल्का… आसान… बेफिक्र।लेकिन शायद उनमें से किसी ने भी कभी सच में महसूस नहीं किया —वो अहसास…जो इस देश में बरसों से एक दूसरे समाज के लोग हर दिन महसूस करते आए हैं।हर रोज़।हर जगह।जहाँ वे काम करते हैं…जिनके लिए काम करते हैं…वहीं कहीं न कहीं “ऊँच-नीच” का एक शब्द…एक इशारा…एक नजर…अनजाने में ही सही…फिसल ही जाता है।कई बार भेदभाव चीखता नहीं…बस धीरे से बोलता है।और सुनने वाला…चुप रह जाता है।हम सबको लगता है कि समय