राख से उठता हुआ सपनामैं जला था उस दिन,जब हालातों ने मेरे घर का पता पूछा था,और किस्मत ने खामोशी सेदरवाज़े पर ताला लगा दिया था।चारों तरफ धुआँ था,लोगों की आँखों में अफ़सोसऔर मेरी हथेलियों मेंकुछ अधजले ख़्वाब।कहते हैं —राख में कुछ नहीं बचता,पर उन्होंने शायदउम्मीद को जलते नहीं देखा।मेरे सपनों की चिंगारीअब भी वहीं थी,ठंडी ज़रूर पड़ी थी,पर मरी नहीं थी।मैंने उस राख को उठाया,माथे पर लगा लिया,जैसे कोई योद्धाअपने ज़ख्मों को छुपाता नहीं,उन्हें अपनी ताक़त बना लेता है।लोग हँसते रहे,कहते रहे —“अब क्या बचा है तेरे पास?”मैं मुस्कुराता रहा,क्योंकि मुझे पता थाराख उड़ती नहीं,उड़ान का इशारा करती है।मेरी