(रात का समय। हवेली के बाहर सन्नाटा। अंदर बच्चों के कमरे में हल्की-सी रोशनी।)कुछ रातें नींद नहीं लातीं… सुकून लाती हैं।और इस हवेली में हर रात अब किसी के आने का वक़्त तय था।(सुनीति और कौशिक धीरे-धीरे कमरे में आते हैं। उनके कदमों की कोई आवाज़ नहीं।)सुनीति(मुस्कुराकर) बोली - “देखिए…आज भी कितनी शांति से सो रहे हैं।”कौशिक बोला - “शायद इन्हें महसूस होता है कि कोई है… जो इन्हें छोड़कर नहीं जाएगा।”(सुनीति आरुषि के सिरहाने बैठती है। हल्के से उसके बालों में उँगलियाँ फेरती है।)वो हाथ दिखते नहीं थे…पर उनकी गर्माहट बिल्कुल माँ जैसी थी।(आरुषि नींद में करवट बदलती है, होंठों पर