जबरदस्ती गले पड़ना

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कितनी भी व्यस्तता हो, चाहे सांस लेने की फूरसत भी न मिले, मगर थोड़ी सी मानसिक फुरसत मिलने पर भला किसका मन एकबारगी अपने बचपन को याद करने में नहीं जाता होगा। और तब जब बचपन को कोई साथी मिल जाए।अचानक से जब हरला का ध्यान ओम पर गया तो, हरला के मन-मस्तिष्क में खुशी का संचार हुआ और जिसकी पुष्टि उसकी चमकती हुयी आँखों ने की। ऐसा बिल्कूल नहीं था कि दोनों एक साथ खेले-कुदे थे, और एक साथ ही रहे थे। दोनों में जान-पहचान इतनी ही थी कि दोनों एक अगल-बगल गाँव के ही थे, एक था भोगनिया