वंशिका ने रात भर अपनी योजना को शब्द दिए थे। उसने तय कर लिया था कि वह अब और बर्दाश्त नहीं करेगी। जैसे ही सूरज की पहली किरण कमरे में दाखिल हुई, उसका बुखार तो उतर गया था, लेकिन मन का उबाल शांत नहीं हुआ था। वह उठकर बाहर जाने ही वाली थी कि मुख्य द्वार पर ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजने लगी। इतनी सुबह कौन हो सकता था?जैसे ही काया ने दरवाज़ा खोला, घर का माहौल एक पल में बदल गया। सामने मनोरमा देवी और शिखा खड़ी थीं, उनके हाथों में भारी सूटकेस थे और चेहरों पर वही पुरानी अधिकार