अध्याय 3: रक्तरंजित हल्दीघाटी सूरज अब सिर पर था। हल्दीघाटी की पथरीली धरती पर रक्त बह रहा था, और हवा में तलवारों की टकराहट, घोड़ों की हिनहिनाहट और घायल सैनिकों की चीखें गूंज रही थीं। यह सिर्फ एक युद्ध नहीं था - यह मेवाड़ की आन-बान-शान की अंतिम परीक्षा थी! रणभूमि में हाहाकार राजपूतों की तलवारें लगातार शत्रु के खून से लाल हो रही थीं। मुग़ल सेना संख्या में कहीं अधिक थी, लेकिन प्रताप के वीर योद्धाओं ने हल्दीघाटी को उनके लिए नर्क बना दिया था। "जय एकलिंग!" "जय मेवाड़!" इस गर्जना के साथ प्रताप के घुड़सवार दुश्मनों के