अदृश्य पीया - 15

(कमरा वही है… पर अब खाली नहीं—बल्कि दिखाई न देने से भरा हुआ।)(ना सुनीति दिख रही है, ना कौशिक। सिर्फ़ दो साँसों की आवाज़ें।)अब वो अकेली नहीं थी…अब वो दोनों हीदुनिया की नज़रों से ग़ायब हो चुके थे।सुनीति (टूटी हुई आवाज़ में) बोली - “मुझसे गलती हो गई कौशिक…मैंने सोचा था मेरे अदृश्य होने से आप बच जाएँगे…”(वो अपने हाथ देखती है—कुछ भी नहीं।)सुनीति बोली - “पर मुझे ये नहीं पता था कि जिस दवा को मैंने पिया…उसका कोई antidote ही नहीं है…”(कौशिक उसे देख रहा है। अदृश्य आँखों से अदृश्य आँसू। वो दोनों अब एक दूसरे को बिना चश्मे के भी