इस घर में प्यार मना है - 15

उस दिन मनमोहन और प्रार्थना किसी काम से गाँव के दूसरे छोरगए हुए थे। घर पहली बार पूरी तरह खामोश था। केशव ने मौका देखाकेशव (थोड़ा झिझकते हुए) बोला - सत्यभामा…आज बस हम दोनों…थोड़ी देर बात करें?सत्यभामा (मुस्कुराकर) बोली - क्यों नहीं…छत पर धूप ढल चुकी थी। हवा हल्की ठंडी थी। दोनों पास-पासबैठे। बातों का सिलसिला चालू हुआ।केशव बोला - तुम्हें पता है…मैंने कभी ज़िंदगी से कुछ नहीं माँगा था।सत्यभामा बोली - और अब?केशव (धीरे से) बोला - अब…सिर्फ़ तुम्हें चाहता हूं।सत्यभामा कुछ नहीं बोली। बस नज़रें झुका लीं।केशव बोला - उस हवेली में…मैं पत्थर बन चुका था।पर तुमने…मुझे फिर से इंसान बना दिया।सत्यभामा की आँखें