सुरक्षा-छत्र

गर्मी की दोपहर पूरे उन्माद पर थी। बाज़ार की चहल-पहल धीमी पड़ चुकी थी। श्यामा अपनी कपड़ों की दुकान के काउंटर पर बैठी थी। सामने शीशे के पार सड़क पर धूप बिखरी थी, पर उसके भीतर जैसे बरसों की सांझ उतरी हुई थी। दुकान में काम करने वाली दोनों लड़कियाँ बैग सँभालते हुए बोलीं, “आंटी, अब ग्राहक नहीं आएँगे… आप भी घर चली जाइए, थोड़ा आराम कर लीजिये।” शाम को पांच बजे आ जायेंगे हम...श्यामा ने सहज स्वर में कहा, “तुम लोग जाओ। मैं थोड़ी देर और बैठती हूँ, कुछ देर में चली जाऊंगी ।”दरवाज़ा बंद हुआ। भीतर सन्नाटा फैल