नीलू और नीला तारा

  धनपुर की सुबह : धनपुर की सुबह धूल और आदतों से बनी होती है। सूरज निकलने से पहले ही गलियों में झाड़ू की सरसराहट, चूल्हों की खटखट और अधखुली नींद की खाँसी तैरने लगती है। नीलू इन्हीं आवाज़ों में जागती थी—बिना अलार्म के, बिना उम्मीद के। उसका घर छोटा था, पर खामोशियों से भरा। दीवारों पर नमी के धब्बे ऐसे लगते थे जैसे समय ने उँगलियों से छूकर उन्हें वहीं छोड़ दिया हो। नीलू आईने से नज़र चुराती—क्योंकि आईना सवाल पूछता था, और उसके पास जवाब नहीं थे।   स्कूल, जहाँ नाम खो जाते हैं : सरकारी स्कूल की