ईश्वर भक्त नष्ट नहीं होता

ऋगुवेद सूक्ति-- (१०) की व्याख्या “न रिष्यते त्वावतः सखा” — (जो ईश्वर का सखा/भक्त है वह नष्ट नहीं होता) —इस भाव की पुष्टि अनेक उपनिषदों में मिलती है। प्रस्तुत हैं प्रमुख प्रमाण —(१) कठोपनिषद् (१.२.२३)“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥”भावार्थ — आत्मा उसी को प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं (ईश्वर) स्वीकार करता है।अर्थात् जो ईश्वर का प्रिय होता है, वही सुरक्षित और सफल होता है।(२️) श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१८)“यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं…तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥”भावार्थ — मैं उस परमदेव की शरण ग्रहण करता हूँ जो आत्मबुद्धि को प्रकाशित