अनकही देहलीज़

अनकही देहलीज़भाग 1: अदृश्य रेखाएं"साहब, चाय टेबल पर रख दी है।"आदित्य ने अपनी फाइल से नज़रें नहीं हटाईं। खिड़की के बाहर शहर की शोर भरी शाम ढल रही थी। कमरे में रोशनी कम थी, पर वह अंधेरे में ही बैठने का आदी था। उसे उजाले से अब एक अजीब सी चिढ़ होने लगी थी, जैसे रोशनी उसकी आत्मा की दरारों को उघाड़ देगी।"चीनी कम डाली है न, सावित्री?"सावित्री ने कमरे के कोने में पड़े पुराने फूलदान को करीने से सजाते हुए कहा, "जी साहब, आपकी सेहत का ख्याल है मुझे। और वो... दवाई का डब्बा खाली होने वाला है। कल