आलोचना : एक जासूसी लेखक की मुकम्मल जिंदगी की दास्तान : आत्मकथा: पानी केरा बुदबुदा __________________________आत्मकथाएं कुछ बुरी होती हैं,कुछ काल्पनिक उपन्यास सी,कुछ झूठ का पुलंदा और कुछ कम बुरी । अकसर वह हमें उस दुनिया में ले जाती हैं जो हमारी पहुंच और सोच से दूर होती हैं। वह दुनिया जो हम दूर से देखते,समझते हैं कि खासी चमकीली होगी,सहज होगी और क्या ही शानदार होगी। फिर एक आह निकलती है कि "काश हम भी जी पाते"। फिर जब आत्मकथा पन्ने दर पन्ने पढ़ते जाते हैं तो समझ आती है सच्चाई। यह आसान नहीं हुआ। किस तरह से ग्रासरूट