कोई दर्द नहीं सुनता

वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी।     सुबह का सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था। हल्की पीली रोशनी मजदूरों के अड्डे पर पसरी हुई थी- जैसे रात और दिन के बीच कोई थका हुआ समझौता हो गया हो। कुछ लोग बीड़ी सुलगा रहे थे, कुछ चाय की बाट देख रहे थे और कुछ ऐसे भी थे, जो खाली आंखों से सड़क को ताक रहे थे, मानो वहां कोई राह निकल आएगी। इन्हीं में माधव खड़ा था। उम्र ढल चुकी थी। पीठ झुक गई थी और कपड़ों की सिलाई में गरीबी ने स्थाई घर बना लिया था । आंखों में नींद नहीं, बल्कि