अदृश्य पीया - 13

(सुबह का समय। घर में सन्नाटा। कौशिक ऑफिस के लिए निकल चुका है—चश्मा लगाए हुए।)(सुनीति दरवाज़े के पास खड़ी उसे जाते हुए देखती है। आँखों में डर, मन में बेबसी।)जब हर रास्ता बंद हो जाए… तब इंसान भगवान के दरवाज़े पर पहुँचता है।(सुनीति मंदिर के बाहर खड़ी है। नंगे पाँव, हाथ में चुनरी।)(घंटी की आवाज़ गूँजती है।)(वो धीरे-धीरे अंदर जाती है और एक कोने में बैठ जाती है।)(मंदिर में शांति है। धूप की खुशबू। आरती की धीमी आवाज़।)(सुनीति दोनों हाथ जोड़ती है… पर शब्द नहीं निकलते।)(कुछ पल बाद—)सुनीति (सिसकते हुए) बोली - “भगवान…मैंने आपसे कभी कुछ नहीं माँगा…”(उसकी आवाज़ काँपती है।)सुनीति