त्रिशा... - 35

बीती रात की यादों के सजीव होते ही त्रिशा के मन में कड़वाहट भर गई। वह खुद के लिए बहुत हीन सा महसूस करने लगी। खैर जो भी हो यह सिंदूर तो उसे लगाना ही था। त्रिशा ने सिंदूर लगाया और सिर पर पल्ला करके तैयार होकर बैठ गई और इंतजार करने‌ लगी किसी के आने और उसे नीचे ले जाने का। त्रिशा बैठकर खुद को सामने लगे आईने में देखने लगी और अपने मन में चल रही विचारों के बारे में  सोचने लगी। उसके मन में उठ रहे सभी विचारों की अब खिचड़ी पक चुकी थी। सारी बात आपस में