विचलित मन

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---विचलित मन लेखक: विजय शर्मा एरी  प्रस्तावनामनुष्य का मन एक नदी की तरह है—कभी शांत, कभी उफान पर। जब जीवन की परिस्थितियाँ उसे झकझोरती हैं, तो वह विचलित हो जाता है। यह कहानी एक ऐसे युवक की है, जो अपने सपनों और वास्तविकताओं के बीच उलझकर आत्मसंघर्ष करता है।  ---कहानी1. शुरुआतअमन, दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र, साहित्य का दीवाना था। किताबों में डूबा रहने वाला यह युवक अक्सर अपने दोस्तों से अलग-थलग पड़ जाता। उसके भीतर एक बेचैनी थी—कुछ बड़ा करने की, कुछ ऐसा लिखने की जो समाज को बदल दे। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति और पिता की अपेक्षाएँ उसे बार-बार विचलित कर