दुहाई- तिहाई

                  “धर्मवीर,” अपनी अर्द्धचेतना में जाई मुझे ठीक पहचान न पाईं। समझीं, मैं यशवीर नहीं हूं। धर्मवीर हूं।                   “हूं,” मैं ने उन का भ्रम न तोड़ा और भैया के अंदाज़ में हुंकार भरा। यों भी अपने इस चौदहवें साल तक आते- आते जैसे ही मेरे शरीर ने एक निश्चित बनावट और ऊंचाई हासिल की है, पुराने जानने वाले लोग कहने लगे हैं, कैसे तो धर्मवीर को देख कर बारह- तेरह साल पहले वाले यशवीर का धोखा हो जाता है!