अधूरापन

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1बरसात की वह शाम न तो बहुत ख़ुशनुमा थी, न ही बहुत उदास।बस एक अजीब-सी चुप्पी थी—जैसे आसमान कुछ कहना चाहता हो, लेकिन शब्द नहीं मिल रहे हों।नीरज बरामदे में खड़ा था। सामने सड़क पर पानी जमा हो गया था और उसमें पड़ती स्ट्रीट लाइट की रोशनी टूट-टूट कर बिखर रही थी। उसे हमेशा से लगता था कि ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है—एक रोशनी, जो पूरी तरह कभी दिखाई नहीं देती।पीछे से चाय की हल्की-सी आवाज़ आई।“ठंडी हो जाएगी,”अन्वी ने कहा।नीरज ने पलटकर देखा। वही सादा सूट, वही खुले बाल, वही आँखें—जिनमें सवाल हमेशा रहते थे, जवाब कभी नहीं।“अभी