इस घर में प्यार मना है - 13

गाँव की सीमा। चारों रात भर चलते रहे। पैरों में छाले थे। साँस टूटी हुई थी। सूरज उग चुका था , जब उन्हें एक छोटा सा गाँव दिखा।मोहन (थकी आवाज़ में) बोला - भैया…बस…अब नहीं चल पा रहा…।कार्तिक रुक गया। संस्कृति अब भी उसकी गोद में थी। पूजा भी लड़खड़ा रही थी। जैसे ही चारों गाँव की पहली गली में घुसे—लोगों ने उन्हें देख लिया।एक बूढ़ा आदमी (घबराकर) बोला - अरे…ठाकुर साहब!कुछ ही पल में…खबर आग की तरह फैल गई।रघुवंशी आए हैं…जहाँ डाँट पड़नी चाहिए थी वहाँ—लोग सिर झुकाकर खड़े हो गए। औरतें घूँघट में। मर्द नज़रें नीचे।गाँव का प्रधान (काँपती आवाज़