सुबह का समय था।हल्की धूप आँगन में बिखर रही थी।चित्रा चुपचाप बैठी, बच्चे को गोद में लेकरधीरे–धीरे तेल की मालिश कर रही थी।उसकी उँगलियों में ममता थी,आँखों में अपनापन,और दिल में एक सच्चा वादा—“मैं इस बच्चे को हमेशा सुरक्षित रखूँगी।”पर दादी सास का दिल…ममता नहीं, शक से भरा था।“अरे–अरे! ऐसे मालिश करते हैं!?”तूफान सी आवाज़ गूँजी।“ज़रा भी तमीज़ नहीं! बच्चे की हड्डी तोड़ देगी क्या!?”चित्रा घबरा गई, पर फिर भी धीरे बोली—“दादी माँ… मैं पहली बार किसी बच्चे को संभाल रही हूँ…आप बताइए ना, कैसे करूँ?मैं सीख जाऊँगी।”पर दादी सास़ के दिल में पिघलने की जगहऔर सख़्ती जम गई।“सीख लेगी!?