तभी जेठानी अंदर आई।हाथ में चाय।चेहरे पर माँ जैसी चिंता की एक्टिंग।“अरे… थक गई होगी… इतने काम कर लिए…”वह बोली।चित्रा ने विनम्रता से सिर झुका दिया।“नहीं दीदी, मैं ठीक हूँ…”“बहुत सर्विस कर रही हो इस घर की…”जेठानी ने बात को मीठाई में लपेटा।“लेकिन ध्यान रखना… हर जगह इतनी इज़्ज़त नहीं मिलती… घर में बड़ी-बूढ़ियाँ जैसी भी आएँ… उनका मिज़ाज झेलना पड़ता है।”चित्रा समझ नहीं पाई।पर उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उतर गई।रात को ही जेठानी ने अपने पति से बात की।“दादी को शहर बुला लेते हैं।”उसने कहा।“उन्हें यहाँ रहना चाहिए… आखिर पोते की जिम्मेदारी है।”असल बात कुछ और थी—वह चाहती