जैसे-जैसे Sneha घर के करीब पहुँच रही थी, उसके मन में एक अजीब-सी उम्मीद जाग रही थी।उसे लग रहा था—शायद घर पहुँचते ही इस परेशानी से छुटकारा मिल जाएगा। शायद मम्मी सब ठीक कर देंगी।जैसे ही Sneha ने घर की चौखट के अंदर कदम रखा, सामने आँगन का रोज़ का ही दृश्य था—दादा और दादी चारपाई पर बैठे हुक्का और चिलम पी रहे थे।मम्मी भैंसों के पास काम कर रही थीं।Sneha धीरे-धीरे सबकी नज़रों से बचते हुए मम्मी की तरफ बढ़ी।वह बस मम्मी की गोद में छुप जाना चाहती थी—जैसे बचपन में हर डर से बच जाती थी।जैसे ही मम्मी