बिल्ली जो इंसान बनती थी - 4

सुबह की हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। खिड़की से आती रोशनी शानवी के चेहरे पर पड़ी…और उसकी नींद टूट गई।लेकिन आज…वो उठते ही चौंक गई। उसका दिल…बिना किसी वजह के तेज़-तेज़ धड़क रहा था। साँसें थोड़ी भारी थीं।वो बोली - अजीब है...!उसे याद नहीं था कि उसने कोई बुरा सपना देखा हो…लेकिन फिर भी…उसके मन में एक बेचैनी थी। एक अजीब सा डर…जैसे…किसी ने बहुत दर्द सहा हो…और उसकी चीखें…कहीं न कहीं…उसके दिल तक पहुँच गई हों। उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।वो बोली - क्यों ऐसा लग रहा है… जैसे कुछ बहुत गलत हुआ हो?उसी वक्त…बिस्तर के पास वही