अदृश्य पीया - 12

(कमरे में हल्की नीली रोशनी। खिड़की के बाहर भोर होने को है।)(सुनीति कौशिक की बाहों में है। उसकी साँसें अब शांत हैं, लेकिन आँखें खुली हुई।)कुछ आँसू दूसरों के लिए होते हैं… और कुछ आँसू खुद के लिए रोने का साहस देते हैं।(कौशिक की पकड़ ढीली पड़ती है। वो थककर सो चुका है।)(सुनीति धीरे से खुद को अलग करती है।)(वो खिड़की के पास जाकर बैठ जाती है। सामने उगता सूरज, लेकिन उसकी आँखों में अंधेरा।)सुनीति (अपने आप से, फुसफुसाकर) बोली - “मैं मजबूत बनने की कोशिश मे खुद को कब भूल गई… पता ही नहीं चला।”(उसकी आँखें भर आती हैं, लेकिन