आँगन में अब सन्नाटा नहीं था—वहाँ डर जम गया था। कार्तिक अब भी दरवाज़े की तरफ़ भागना चाहता था—कि तभी उसके पिता आगे आए। आवाज़ शांत थी, पर निर्दयी।ससुर बोले - बहुत हो गया, कार्तिक।उन्होंने कार्तिक के हाथ को ज़ोर से पकड़ा—और मोहन की तरफ़ इशारा किया।वो बोले - तुम दोनों—अभी।कार्तिक और उसका छोटा भाई मोहन—दोनों को एक कमरे में धकेल दिया गया।धड़ाम!दरवाज़ा बंद।बाहर से कुंडी चढ़ी—और ताला।अंदर…कमरे में अँधेरा नहीं था—पर घुटन थी।मोहन घबराया हुआ इधर-उधर देख रहा था।मोहन (काँपती आवाज़ में) बोला - भैया…ये क्या हो रहा है?कार्तिक ने पूरी ताक़त से दरवाज़ा पीटना शुरू किया।कार्तिक बोला - दरवाज़ा खोलिए!आपको अंदाज़ा भी