बिल्ली जो इंसान बनती थी - 3

सोमवार की सुबह थी। शानवी को ऑफिस जाना था।वो एक इंजीनियर थी — समय की पाबंद और अपने काम में सीरियस। उसने हल्के रंग का सूट-सलवार पहना, बाल ठीक किए और तैयार होकर आई। फिर उसकी नजर बिस्तर पर सो रहे उस सफेद बिल्ले पर पड़ी।शानवी बोली - तुम्हें अकेला छोड़ दूँ?फिर मुस्कुराई।बोली - नहीं… तुम्हें भी अपने साथ ले चलती हूँ।उसने बिल्ले को गोद में उठाया। वो बिना किसी विरोध के… बस “म्याऊँ” करके चुप हो गया। शानवी ने उसका बैग तैयार किया और उसे अपने साथ ऑफिस ले गई।उसने सोचा था —मेरा अपना पर्सनल केबिन है… वहीं रख दूँगी।वैसे भी