दादी की आखिरी चिट्ठी (चिट्ठियाँ जो दादी ने नहीं लिखीं…)

अर्जुन के हाथ काँप रहे थे। सामने वही पीला लिफाफा था—जिस पर दादी की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट थी। दादी को गुज़रे पूरे दस साल हो चुके थे, फिर भी हर साल उसके जन्मदिन पर यह चिट्ठी आती थी। आज उसका 30वाँ जन्मदिन था, और इस बार लिफाफे पर लिखा था—“मेरे लाल… आज सच जानने का दिन है।” अर्जुन की आँखें भर आईं। लिफाफे में वही दादी की खुशबू थी—मोती जैसी सफेद साड़ी, हल्की सी चंदन की महक… जैसे दादी अभी भी यहीं कहीं बैठी हो। उसने धीरे-धीरे लिफाफा खोला। हर साल की तरह एक चिट्ठी थी, पर इस बार एक पुरानी