प्रदेश के किनारे का एक छोटा-सा गाँव। कमरा भारी था। दीये जल रहे थे, पर उजाला नहीं था। मिट्टी की दीवारों से धुआँ चिपका हुआ था—जैसे जंगल की लड़ाई यहाँ तक चली आई हो। जख्खड़ सिर झुकाए चौकी पर बैठा था। कंधे की चोट अब भी सुलग रही थी, पर दर्द से ज़्यादा बोझ किसी और चीज़ का था। बाहर, गाँव की औरतें विलाप कर रही थीं। किसी माँ की चीख अचानक तेज़ हो जाती, फिर टूटकर सिसकी में बदल जाती। किसी के हाथ में बेटे की कमीज़ थी। किसी के आँचल में खून सूख चुका था। जीवन पास बैठा