रसोई में चाय उबल रही थी। रश्मि अदरक कूट रही थी और सौम्या कप ट्रे में सजा रही थी। भाप और दूध की गंध में एक घरेलू-सा सुकून था—जैसे सब ठीक हो। सौम्या ट्रे उठाकर बाहर आई। ड्रॉइंग रूम रोशनी से भरा था। बड़े सोफ़ों पर पशुपति बाबू बैठे थे—सफेद धोती-कुर्ता, कंधे पर डिज़ाइनर शॉल, मोटी सफ़ेद मूँछें और पीछे सँवारे बाल। उनके साथ उनकी पत्नी और बच्चे। सामने सौम्या के माता-पिता। हँसी-मज़ाक चल रहा था, जैसे घर में कोई दरार हो ही नहीं। “ये बच्ची हमारे घर आ रही है,” पशुपति बाबू बोले, “बहुत ख़ुशी है हमें।” ठाकुर धुरंधर