शादी में छह दिन बाकी थे। आँगन में मेहँदी की रस्म चल रही थी। सौम्या ज़मीन पर बिछे गद्दों पर बैठी थी। उसके चारों ओर औरतों का घेरा था—हँसी, गीत, चूड़ियों की खनक। उसकी हथेलियों पर मेहँदी चढ़ रही थी, गाढ़ी, ठंडी, धीरे-धीरे आकार लेती हुई। उसकी नानी, कामिनी देवी, झुकी हुई करीने से डिज़ाइन बना रही थीं। उम्र ने उनकी उँगलियाँ काँपती ज़रूर कर दी थीं, पर पकड़ अब भी मज़बूत थी। किसी ने कहा, “अरे, ये मेहँदी तो लड़के वालों की तरफ़ से आई है।” सौम्या के भीतर कुछ चुभा। एक पल को आँगन की आवाज़ें पीछे हट