पत्थर कि प्रेम

घर के सबसे ज्यादा खालीपन अगर कहीं था, तो वह मेरे ताऊजी की आँखों में था। पिताजी के जाने के बाद, मैंने सोचा था कि ताऊजी के रूप में मुझे एक दूआंगन के बीचों-बीच लगी वह पुरानी तुलसी अब सूखने लगी थी। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे उस घर के रिश्तों में बची-खुची नमी भी उसी के साथ भाप बनकर उड़ गई हो।मेरे पिताजी की मृत्यु को अभी मुश्किल से तीन महीने ही हुए थे। घर का हर कोना उनकी यादों से भरा था, लेकिनसरी छत मिल जाएगी। आखिर खून तो एक ही था। हम दोनों ही तो अकेले