इन्द्रप्रस्थ की सभा उस दिन विशेष रूप से सजी हुई थी। राजसूय यज्ञ के बाद पांडवों का यश चारों दिशाओं में फैल चुका था। राजमहल के प्रांगण में सुवर्ण स्तंभ चमक रहे थे, सुगंधित धूप की महक वातावरण को पवित्र बना रही थी, और सभा में विद्वान ब्राह्मण, वीर योद्धा तथा मंत्रीगण विराजमान थे। परंतु उस वैभव के बीच धर्मराज युधिष्ठिर के हृदय में एक सूक्ष्म चिंता थी।राज्य विस्तार पा रहा था, प्रजा सुखी थी, किन्तु युधिष्ठिर जानते थे कि केवल वैभव ही आदर्श शासन का प्रमाण नहीं होता। राजा का धर्म केवल कर संग्रह और शत्रु-विजय तक सीमित नहीं