मैं कोई लेखक नहीं , ना ही कोई खास तजुर्बा हैं जिंदगी का, बस कुछ सैलाब हैं मन के और लंबी खामोशी की सिसकियां हैं कोशिश करती हु कुछ पिरोने का कुछ अपना कुछ आपका....। हो सकता मानसिक पटल पर अपनी दक्षता दिखने में चूक जाऊंगी पर फिर भी सोचती हु शुद्ध कही दिल को छू जाऊ। एक साधारण सी अति सूक्ष्म दुनिया की नासमझ लड़की हूं। जूझ रही हु खुद से , और जमाने को दिखा रही हूं कि मुझसे बेहतर कोई नहीं , पर सच कहूँ अधिकतर खुद से ही सवाल करती हु कि आखिर मैं हुं क्या....