भीष्मपितामह और धर्मराज युधिष्ठिर का संवाद

कुरुक्षेत्र का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों तक पृथ्वी ने जिस भयानक रक्तपात को देखा था, उसके बाद अब मैदान में केवल सन्नाटा था। टूटी रथों की ध्वनियाँ, बिखरे अस्त्र-शस्त्र, वीरों के निर्जीव शरीर और चारों ओर फैली धूल—मानो स्वयं समय भी ठहर गया हो। पांडव विजयी हुए थे, पर यह विजय उत्सव नहीं, एक भारी बोझ बनकर युधिष्ठिर के हृदय पर बैठ गई थी।हस्तिनापुर की ओर लौटते समय युधिष्ठिर का मन शोक से भरा हुआ था। उनके सामने बार-बार वही दृश्य आ जाता—भीष्म पितामह बाणों की शैया पर लेटे हुए, द्रोणाचार्य का पतन, कर्ण का अंत, और