श्रापित एक प्रेम कहानी - 45

उस तांत्रीक ने अपने जेब से मुठ्ठी बंद करके कुछ निकालता है और मंत्र बड़बड़ाकर वर्षाली पर के उपर फैंक देता है--"“ॐ ह्रीं क्लीं — मायाम्, मायाम् — वशं कुरु, वशं कुरु — स्वाहा।”जिसे वर्शाली को कमजोरी महसूस होने लगती है। तांत्रीक वर्शाली को पकड़ने के जैसे ही आगे अपना कदम बड़ाती है के वर्शाली उस पर भी मणी से शक्ति प्रहार करती है जिसे तांत्रीक बेहोस हो जाता है। वर्शाली के आगे अब अंधेरा छा गया था और वो बेहोसी के हालत मे उसके कदम डगमगाने लगती है जिसका फायदा वो दुसरा आदमी उठाना चाहता है। वो आदमी वर्शाली को