श्रापित एक प्रेम कहानी - 43

उधर वर्शाली और एकांश एक दुसरे को प्यार से बाहों मे भर रखा था और उनपर नीले पुष्प की वर्षा हो रही थी जिससे दोनो ही घुटने पुष्प से ढक जाते हैं। एकांश वर्शाली के होठ को चुमने के लिए आगे बड़ता है पर वर्शाली अपने आपको सम्भांलते हुए कहती हैं--वर्शाली :- नहीं एकांश जी अभी नही ।एकांश कुछ नहीं बोलता है। बस चुपचाप हाथ में रखी मणि को देखने लगता है। वर्शाली एकांश से अलग होती होकर कहती है--वर्शाली :- बस अब और नहीं। वर्शाली के इतना कहते ही वह पुष्प वर्षा रुक जाती है। वर्शाली भूमी पर गीरे पुष्प