शून्य से शिखर तक: एक अजेय संघर्ष की गाथा

एक छोटा सा गाँव था 'रामपुर', जहाँ अमीरी और गरीबी के बीच एक गहरी खाई थी। गाँव के एक कोने में एक जर्जर झोपड़ी थी, जिसकी दीवारें मिट्टी की बनी थीं और छत सूखी घास की। इसी झोपड़ी में १० साल का रामू अपनी माँ, सावित्री के साथ रहता था। रामू के पिता एक मज़दूर थे, जो एक साल पहले एक बड़ी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गए थे। पीछे छोड़ गए थे तो बस एक बूढ़ी माँ की बीमारी और कर्ज का बोझ।​रामू की हालत ऐसी थी कि उसके शरीर पर जो कपड़े थे, उनमें अनगिनत पैबंद लगे थे।