बेटे की चाह

ड्राइंग रूम के पुराने सोफे पर बैठी सुमित्रा देवी अपनी उंगलियों में फंसी माला को बड़ी तेजी से फेर रही थीं। कमरे में अगरबत्ती का धुआं किसी भारी कोहरे की तरह तैर रहा था। नेहा रसोई में चाय की ट्रे सजा रही थी, पर उसके कानों में माला के दानों के टकराने की आवाज़ किसी अदृश्य खतरे की घंटी जैसी लग रही थी।नेहा ने चाय की प्याली मेज पर रखी। सुमित्रा जी ने आँखें नहीं खोलीं।"चाय पी लीजिए माँ जी।" नेहा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।सुमित्रा जी की माला रुकी। उन्होंने आँखें खोलीं और बड़ी बेरुखी से नेहा के