प्रतिदिन की तरह उस दिन भी विद्यालय का वातावरण शांत, अनुशासित और पवित्र था। सुबह की हल्की धूप विद्यालय के विशाल प्रांगण में फैली हुई थी। पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को और भी सौम्य बना रही थी। प्रार्थनासभा का समय हो चुका था। विद्यालय के सभी छात्र अपने-अपने वर्गों की पंक्तियों में खड़े थे। किसी ने आँखें बंद कर रखी थीं, तो कोई आधी खुली आँखों से इधर-उधर झाँक रहा था। बच्चों की मासूमियत और अनुशासन दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे थे।प्रार्थनासभा का मैदान विद्यालय की शान माना जाता था। उसके एक कोने में वर्षों पुराना गुलमोहर का विशाल