इस घर में प्यार मना है - 9

सुबह की पहली किरण अभी खिड़की तक पहुँची भी नहीं थी—कि नीचे से चीख़ने–चिल्लाने की तेज़ आवाज़ें हवेली में गूँज उठीं।संस्कृति अब भी कार्तिक की बाँहों में थी। दोनों गहरी नींद में—जैसे दुनिया से बेपरवाह। अचानक शोर और बढ़ा। संस्कृति हड़बड़ाकर उठी।संस्कृति (घबराकर) बोली - नीचे… क्या हो रहा है?कार्तिक भी चौक गया। उसने घड़ी की तरफ़ देखा, सुबह हो चुकी थी। दोनों जल्दी-जल्दी नीचे पहुँचे।और जो देखा—पूरा घर जैसे कटघरे में खड़ा था।ननद नाइट ड्रेस में घबराई हुई एक कोने में खड़ी थी।ससुर जी गुस्से से काँप रहे थे।देवर आधी नींद में आँखें मलता हुआ।नौकर–नौकरानियाँ सिर झुकाए चुपचाप।और बीच में—सास।बस